Balramji Das Tandon

स्वर्गीय श्री बलरामजी दास टंडन ने अपनी मातृभूमि व लोगों को समर्पित जीवन व्यतीत किया। 1927 में जन्में, वह न केवल भारतीय इतिहास के गवाह रहे हैं बल्कि देश व विशेष रूप से पंजाब के इतिहास में एक सार्थक योगदानकर्ता हैं। वह स्वतंत्रता सेनानी, आरएसएस प्रचारक, जनसंघ के संस्थापक सदस्य, छह बार के विधायक, चार बार के मंत्री और जुलाई 2014 से अगस्त 2018 तक छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रहे। उन्होंने अपनी जीवन यात्रा 14 अगस्त 2018 को छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के रूप में पूरी की।

संजय टंडन के शब्दों में- “पापा हमेशा मेरे हीरो थे। जब मैं छह साल का था तो वह मुझे आरएसएस की शाखा के लिए ले गए। शाखा ने मुझे बहुत कुछ सिखाया  मैंने देशभक्ति के गीत सीखे और मिट्टी का तिलक लगाना, मिट्टी को प्रणाम करना और ध्वज को प्रणाम करने की (भारत की पवित्र भूमि को सलामी देना, राष्ट्रीय ध्वज के प्रति श्रद्धा दिखाना) भावनाएं जागृत कीं।

president of India Ram Nath Kovind

जब पंजाब में आपात काल के दौरान पापा 19 महीने जेल में थे तब आरएसएस प्रचारक आलोक जी (वर्तमान में विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष) अमृतसर आए और उन्होंने उन बच्चों को साथ लेकर जिनके पिता जेल में थे उनकी रिहाई के लिए सड़क पर एक जुलूस निकाला। यह जुलूस गोल्डन टैंपल के पास निकाला गया ताकि वहां पुलिस प्रवेश न कर सके और गिरफ्तारी से बचा जा सके। मैने अभिमन्यु शाखा का नेतृत्व किया जोकि मेरी पहली अनुभावात्मक शिक्षा थी।

पापा ने मुझे अपने जीवन का मंत्र दिया – हनुमानजी को संबोधित एक प्रार्थना (रामायण में सुंदर कांड का अंश), जिसे मैं लगभग 48 सालों से हर दिन पढ़ रहा हूं। वह शिवाजी, महाराणा प्रताप, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे महान नेताओं की छोटी-छोटी पुस्तकें घर लेकर आए, जिनकी कहानियों ने मुझे प्रेरित किया और अपनी जन्मभूमि (मातृभूमि) के प्रति श्रद्धा की भावना जाग्रत की।

Balramji Das Tandon, Former Governor of Chhattisgarh (2014-2018)

मैं यहां शिक्षा से पूर्ण 5 घटनाओं को साझा करना चाहता हूं जब पिता जी ने मेरे सामने सर्वश्रेष्ठ उदाहरण पेश किए

  1. पंजाब में आपातकाल (1975 – 1977) के दौरान पापा 19 महीने तक जेल में रहे। उस समय एक परिवार के रूप में हम हमेशा चिंतित रहते थे कि इन परिस्थितियों को कैसे संभालेंगे। हमारा भविष्य कैसा होगा?, सरकार नहीं चाहती थी कि जेल में बंद लोगों के साथ किसी तरह का संपर्क बनाया जाए। उस समय हमें अहसास हुआ कि जब आपका परिवार समस्या में हो तो दूसरों का आपके प्रति क्या नजरिया होता है। यह हमारे परिवार के लिए बहुत ही कठिन समय था। परंतु जब भी हम पापा से मिलते थे वह लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा ऊर्जा व उत्साह से भरे होते थे।
    इसी दौरान मेरी दादी का निधन हो गया और पापा सात दिन के लिए जमानत पर घर आए। उस समय के मुख्यमंत्री (ज्ञानी जैल सिंह) अपनी संवेदना व्यक्त करने के लिए हमारे घर आए, उन्होंने हमें पिता जी से उनकी पैरोल बढ़ाने को लेकर बात करने के लिए कहा लेकिन पापा ने इस विचार को नकार दिया और कहा कि यदि कोई ऐसा करता है तो वह उनका मरा मुंह देखेगा” इससे मुझे पता चला कि वह अपने संकल्प के प्रति कितना दृढ़ और प्रतिबद्ध थे। इसने मुझे सिखाया कि मैं हमेशा अपनी सुख-सुविधाओं की परवाह किए बिना सही का साथ देना चाहिए।
  2. एक बार एक ड्राइवर ने पापा के साथ गलत व्यवहार किया। इसे लेकर हम बहुत परेशान थे और चाहते थे कि पापा उसके खिलाफ कार्रवाई करें। परंतु पापा ने  ऑफिस में कहकर उसका किसी दूसरी जगह ट्रांसफऱ करवा दिया। इसके बाद उस ड्राइवर ने एक नए मंत्री के साथ गलत व्यवहार किया जिससे उग्र होकर मंत्री उसे नौकरी से निकालना चाहता था। वह ड्राइवर पापा के पास आया उसने अपनी गलती के लिए उनसे मांफी मांगी और पापा ने उसे बचा लिया। यह देखकर मैने पापा से पूछा कि वह उस ड्राइवर के प्रति इतने दयालू क्यों थे जबकि वह कठोर सजा का हकदार था। उन्होंने कहा कि “लोगों ने ही मुझे यहां तक पहुंचाया है जहां आज मेरे पास फैसले करने का अधिकार है परंतु मुझे अधिकारों का इस्तेमाल विवेकपूर्ण तरीके से करना है, अगर मैं इस ड्राइवर को सजा देता हूं तो इसके परिवार को हानि पहुंचेगी और उनका कोई दोष नहीं है, सजा की तुलना में माफी कहीं अधिक शक्तिशाली है”
  3. जब पापा मंत्री थे तब उनके पास अधिकार थे जोकि हमारे परिवार को काफी आर्थिक लाभ पहुंचा सकते थे। परंतु पापा ऐसे नहीं थे, हमारे पास अमृतसर में एक छोटी फैक्ट्री थी। उस समय सभी फैक्ट्रियों को हर रोज कोल के डिब्बे अलॉट होते थे, जिसमें से हमे हर रोज 10 डिब्बे मिलते थे जिसे पापा आसानी से बढ़ाकर 50 कर सकते थे। परंतु हमारे पास जो 10 डिब्बे थे उन्होंने वह भी किसी अन्य को यह कहकर दे दिए कि अब हम फैक्ट्री को आगे नहीं चला रहे हैं और उन्हें अब कोल के डिब्बों की जरूरत नहीं है। इसे लेकर पूरे शहर में बात होने लगी कि स्थानीय नेता बहुत ईमानदार है क्योंकि उस समय एक कोल के डिब्बे से बहुत अधिक मुनाफा कमाया जाता था।
    इसके कई साल बाद जब पापा फिर से मंत्री थे तब उनके विभाग में कुछ ऑडिट असाइनमेंट के लिए एक निविदा थी। उस समय मैं एक योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में अपनी प्रैक्टिस बढ़ाना चाहता था, लेकिन पापा ने मुझे टेंडर एप्लिकेशन के कागज खरीदने से रोक दिया। इससे मैने सीखा कि पद की ताकत का इस्तेमाल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं किया जा सकता। हर समय पद की प्रतिष्ठा की रक्षा करना महत्वपूर्ण है।
  4. पंजाब में आतंकवाद ने कई परिवारों को प्रभावित किया जो हमारे बहुत करीब थे। उस समय पापा अपने भाइयों और बहनों की मदद के लिए हमेशा सबसे आगे रहते थे। यह देखर हमें आश्चर्य होता था कि वह ख़ुद को जोखिम में क्यों डाल रहे हैं परंतु वह हमेशा लोगों के साथ खड़े रहे। आज मुझे उन क्षेत्रों से विशेष रूप से पंजाब जहां पापा ने काम किया, वहां से लोगों का प्रेम मिलता है। यह मुझे इसलिए मिलाता है क्योंकि पापा इनके साथ उस समय खड़े थे जब उनके साथ कोई खड़ा नहीं हुआ। पापा के जाने के बाद एक महीने तक हमारे घर में इस तरह के लोगों की बाढ़ आई रही जो आकर हमसे कहते थे कि पापा ने नौकरी पाने में उनकी मदद की, घर खरीदने में उनकी मदद की,सामाजिक कार्यों के लिए हर माह उन्हें फंड दिया। आज भी मैं उनकी विनम्रता की कहानियां सुनता हूं, यह कहना उचित है कि  वह उस पद के कारण महान नहीं थे जो उन्होंने प्राप्त किया या वह लोगों से मिले वोट के कारण महान नहीं थे। वह इसलिए महान थे क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को भगवान की रचना के हर हिस्से के साथ साझा किया।
  5. 2007 में जब पापा को चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया गया उन्हें दूसरी पार्टियों के साथ जुड़ने के कई संदेश प्राप्त हुए। परंतु उन्होंने दृढ़ता से कहा कि वह केवल अपनी पार्टी के लिए काम करेंगे। उन्होंने पार्टी को सूचित किया और कहा कि वह अब चुनावी राजनीति में हिस्सा नहीं लेंगे इसके बिना पार्टी उन्हें जो दायित्व सौंपेगी वह उसे पूरा करेंगे। विशालता और ईमानदारी का यह सिद्धांत आज भी पार्टी में प्रचलित है। जब 2014 में मेरे साथ भी यही हुआ और मुझे लोकसभा चुनाव लड़ने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ। उन्होंने मुझसे कहा कि पार्टी के लिए काम करें और कभी भी अपने खून पर सवाल न करें।
Balramji Das Tandon, Deputy Chief Minister, Punjab, speaking at United Nations, Geneva

वह आज भी मेरी मार्गदर्शक ज्योति बने हुए हैं, कभी-कभी जब मैं किसी समस्या का सामना करता हूं तो अक्सर खुद से पूछता हूं कि पापा इसे कैसे संभालेंगे? वह क्या करेंगे? .

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